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भोजपुरी में पढ़ें – विरोधी नेतन के भी पसंद आवेला लालू क हाजिरजवाबी

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एक बार एगो पत्रकार महोदय पूछलें कि आप पर जातिवादी होने का आरोप लगता है त तपाक के कहलें- मैं जातिवादी नहीं हूं. इस देश का गृहमंत्री जातिवादी है. उ काहे लाला कि बेटी से बियाह किया.

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देश क राजनीत में लालू प्रसाद एगो अइसन नाम ह जेकर हाजिरजवाब अउर हंसोड़ सुभाव के आपन त आपन विरोधियों पसंद करत रहलें. अउर त अउर लालू क राजनैतिक कौशल क लोहा उनकर विरोधी नेता भी आजहूं माने लं. मुख्यमंत्री बनला से पहले लालू क हंसोड़पन अउर हाजिरजवाबी के समूचा बिहार क राजनीति बिरादरी जानत रहे. लेकिन मुख्यमंत्री बनना के बाद धीरे धीरे उनकर ई सुभाव पूरा देश जाने लगल. शुरू शुरू में त दिल्ली क मीडिया विशेषकर अंगरेजी मीडिया में उनकरा के मसखरा यानी जोकर नेता के रूप में ही स्थापित करे के परयासो भईल.

ये भी पढ़ें : Bhojpuri: राजनीति में नाप-जोख के बोल काहे कि बाहुबल ‘अनंत’ नइखे
मुख्यमंत्री बनला के बाद जब लालू प्रसाद क पहिला बार विदेश जातरा क कार्यक्रम बनल त एगो अंगरेजी अखबार में – लालू बन गया जेंटलमैन- हेडिंग से खबर छपल. जेमे इ बतावल गइल कि कइसे विदेश जातरा खातिर लालू सूट सिलावत बाड़ें. एकरा बाद उनकर विदेश जातरा क मकसद अउर उपलब्धि से अधिका इ बात क चरचा होवे लागल कि जातरा में लालू क पहनावा क रहल. सिंगापुर क जातरा से लवट क कलकत्ता अइलें तब्बो एक सवाल – का पहिने थे लालू जी उहवां. एपर उ नाराजों होइलें लेकिन फेरों अपना सुभाव लेखा हंसे बतिआवें लगलं पत्रकारन से. समय के साथे आपन हंसोड़ अउर हाजिर जवाब सुभाव के चलिते लालू मीडिया क चहेता बन गइलें. दोसरा ओर उनकर राजनीतिक कौशलता क भी सिक्का जमें लागल चाहे उ आपन दल के नेतन के बीचे होखे चाहे विरोधी नेतन के.

1991 क लोकसभा चुनाव में उनकर कांग्रेस विरोध चरम पर रहल. काहे से कि देश भर में विशेषकर उतरी भारत क परदेसन में कांग्रेस विरोध क लहर के चलिते ही 1989 में केंद्र में जनता दल क अगुआई में राष्ट्रीय मोरचा क सरकार भाजपा अउर बामपंथी दलन क बाहरी सहयोग से बनल रहे. 1991 के मध्यावधि चुनाव में मंडल कमंडल का माहौल हावी रहल लेकिन बिहार में लालू के लक्ष्य कांग्रेस के हरावे के रहे. काहे से कि उ बिहार में तब भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के ही मजबूत मानत रहलें अउर तबकर सचाई भी इहे रहल. लालू भाजपा के उतना मजबूत नाही मानत रहलें.भाजपा के वीपी सिंह सरकार अउर बिहार में लालू सरकार से समर्थन हटा लेले के बाद केंद्र में जनता दल क सरकार त गिर गइल लेकिन लालू प्रसाद क सरकार चलत रहल. लालकिशुन आडवाणी के गिरफ्तार कइला के बाद से लालू क राजनीतिक क्षमता क चरचा होखे लागल. एकरा ठीक पहिले मंडल आयोग क रपट लागू होइला के बाद उनकर देवीलाल क साथ छोड़ि के वीपी सिंह के साथे आवल भी उनकर राजनीतिक दूरदर्शिता मानन गइल रहे. भाजपा के उनकर सरकार से समर्थन वापसी के बाद आपन जोड़ तोड़ क राजनीत क भी परिचय दे देलें. उ समय क बिहार भाजपा अध्यक्ष समरेश सिंह समेत भाजपा के सात विधायकन के तोड़ के जनता दल में शामिल करा लेहलें.

मजेदार बात इ ह कि भाजपा क सात विधायकन में बिहार परदेस भाजपा के पूर्व अध्यक्ष इंदर सिंह भी नामधारी भी रहलें. समरेश सिंह अउर इंदर सिंह नामधारी के उ समय भाजपा के सबसे मजबूत नेता मानल जात रहे. शायद एकरा चलते ही लालू भाजपा के कमजोर आंकत रहें अउर उनकर समूचा फोकस कांग्रेस के हरावे में रहे. एलान कइलें कि बिहार से कांग्रेस के एक्को सीट जीते ना देब. जउन एलान कइलें रहलें लगभग उहें होइल- बेगूसराय से कांग्रेस क पुरान नेता कृष्णा शाही ही एकेले बिहार से जीत पइलीं उहों कई बार क रिकाउंटिंग के बाद.

1990 में पहिला बार मुख्यमंत्री बनने के बाद ही आपन पिछड़ा अउर मुस्लिम वोट बैंक मजबूत करे में लागि गइलें अउर सफल भी भइलें. एही भरोसे ही कहें लगलें कि 15 साल तक बिहार में राज करब. 1995 के बिहार चुनाव से पहिले खास सहयोगी नीतिश कुमार के समता पार्टी बना लेला के बादो उ चुनाव लालू बहुत मजबूती से जीत गइलें जबकि समता पार्टी क खाता में मात्र पांचे सीट आइल. शायद इ हे कारण होई कि 1996 में जब चारा घोटला क जांच लालू के न चाहला के बावजूद हाईकोर्ट के कहला पर सीबीआई के गइल तब संसद क ऊपरी बरमदा में पत्रकारन से बात करत नीतिश कुमार कहे लगलें कि लालू यादव राजनीतिक व्यक्ति हउअन. आसानी से हार ना मनिहें. राजनीतिक तौर पर लड़ाई लड़िहें. अब भला लालू यादव क क्षमता के नीतिश कुमार से ज्यादा के जान सकि ला. बिहार क कुरसी क लड़ाई में आगि चलिके उ नीतिश कुमार से कई बार हरलं. फिर जब भाजपा से अलिगा होके नीतिश संकट में रहलें त संकटमोचक भी बनलां. फिर 2015 क चुनाव में महागंठबंधन बना के नीतिश कुमार के फेरो मुख्यमंत्री बनउंलं बड़ भाई लेखा.

लालू क राजनीतिक कौशल क त अनगिनते किस्सा हव लेकिन उनकर हाजिरजवाबी क कउनों जवाब नइखे. 2004 के यूपीए एक क सरकार में एक बार संसद में लालू यादव रेलमंत्री रहते जब बोलत रहलें त तृणमूल कांग्रेस क नेता ममता बनर्जी क नाम लेहले बिना कहलें कि कुछ लोगन के रेल मंत्रालय चाहत रहे न मिलल त सरकार में शामिल ना होइल उनकर पार्टी. एपर ममता बनर्जी बोले लगली- नहीं मांगा था रेल मंत्रालय. इहे बार बार कहला पर लालू कहलें – क्या नहीं मांगा था. नहीं मांगा था तो मिलेगा भी नहीं. एपर पूरा सदन ठहाका लगा देलस. का पक्ष का विपक्ष. लालू अपने भी हंसे लगलें. उनकर इहें खूबी ह कि दोसरन के हंसा के अपनों हंसे लगेलं.

उनकर हाजिर जवाबी क भी कई किस्सा ह. एक बार एगो पत्रकार महोदय पूछलें कि आप पर जातिवादी होने का आरोप लगता है त तपाक के कहलें- मैं जातिवादी नहीं हूं. इस देश का गृहमंत्री जातिवादी है. उ काहे लाला कि बेटी से बियाह किया. उ समय पीएम चंद्रशेखर क मंत्रिमंडल में सुबोधकांत सहाय गृह राज्यमंत्री रहें अउर टीवी कलाकार रेखा सहाय से उनकर ओही समय बियाह होइल रहल. एही तरह एक बार सवाल होइल मुख्यमंत्री लालू प्रसाद नया घर बनवले बाड़न. जवाब में कहलें घर बनाइब त गृह परवेशों होई न. फिर उ समय क मुख्य सचिव अरुण पाठक की ओर इशारा कर के कहलें- बाबा, आप गृह परवेश क पूड़ी खाहें हैं, उ ना में मुड़ी हिलवलें त कहलें देखिए गृह परवेश करेंगे तो बाबा को पूड़िओ न खिलायेंगें का. कुछ एइसने रहे लालू क हाजिरजवाबी क अजबे गजबे अंदाज जेपर केहू क भी हंसी छूट जाई. ( डिसक्लेमर – लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार है.)

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Source From : News18

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